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Home देश-विदेश

टेलीग्राम पर शिकंजा: क्या NEET की सुरक्षा के लिए 15 करोड़ यूजर्स की आवाज दबाई जा सकती है?

by Kajal Seth
June 19, 2026
in देश-विदेश
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NEET-UG 2026 की दोबारा परीक्षा से ठीक पहले टेलीग्राम पर केंद्र सरकार की अस्थायी रोक ने देश में डिजिटल अधिकारों, राष्ट्रीय सुरक्षा और परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार का दावा है कि टेलीग्राम अपराधियों, साइबर गिरोहों और पेपर लीक (NEET) नेटवर्क का प्रमुख माध्यम बन चुका है, वहीं दूसरी तरफ सवाल यह उठ रहा है कि क्या कुछ लोगों की कथित गलतियों की कीमत करोड़ों आम यूजर्स को चुकानी चाहिए। इसी टकराव के बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने टेलीग्राम की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस तेजस करिया ने केंद्र सरकार से महत्वपूर्ण सवाल पूछा कि क्या केवल इसलिए 15 करोड़ से अधिक भारतीय यूजर्स के अधिकारों को सीमित किया जा सकता है क्योंकि कुछ नागरिक एक परीक्षा (NEET) देने जा रहे हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या किसी परीक्षा की सुरक्षा के नाम पर इतने बड़े स्तर पर संचार के अधिकार को प्रभावित करना उचित है। कोर्ट ने टेलीग्राम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता से भी सवाल किया।

अदालत ने कहा कि बहस केवल इस मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की शक्तियों की प्रकृति और उनके इस्तेमाल के दायरे से भी जुड़ी हुई है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी विशेष जानकारी को ब्लॉक किया जा सकता है तो पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है। दोनों पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत जारी ब्लॉकिंग आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

सरकार ने क्यों बताया फैसला सही?

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि ब्लॉकिंग आदेश पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए जारी किया गया था। उन्होंने बताया कि बाद में कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली एक समीक्षा समिति ने भी इस फैसले की जांच की और उसे सही पाया। सरकार का कहना था कि उसके पास पर्याप्त सामग्री और इनपुट मौजूद हैं, जो यह संकेत देते हैं कि परीक्षा (NEET) में गड़बड़ी और संगठित धोखाधड़ी के लिए टेलीग्राम का दुरुपयोग किया जा रहा था। तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि इस मामले में व्यापक जनहित को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अटॉर्नी जनरल ने किया फैसले का समर्थन

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी सरकार के रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ब्लॉकिंग आदेश अपने आप में पूर्ण था और उसमें कार्रवाई के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए थे। उन्होंने तर्क दिया कि अनुपातिकता यानी प्रोपोर्शनैलिटी के सिद्धांत के आधार पर टेलीग्राम की चुनौती तथ्यों के अनुरूप नहीं है। वेंकटरमणी ने कहा कि यदि भारत जैसा देश संभावित नुकसान (NEET) को रोकने के लिए समय रहते कार्रवाई नहीं करेगा तो फिर सरकार के पास विकल्प क्या बचेगा। उनके अनुसार प्रशासन का दायित्व केवल नुकसान के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि उससे पहले रोकथाम करना भी है।

केंद्र का दावा: टेलीग्राम बन रहा नया डार्क वेब

सरकार ने अदालत में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में टेलीग्राम को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। केंद्र ने कहा कि आतंकवाद, साइबर अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे अवैध गतिविधियों (NEET) के लिए टेलीग्राम का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। सरकार के अनुसार यह प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे “नया डार्क वेब” बनता जा रहा है। हलफनामे में कहा गया कि अपराधी समूह अब डार्क वेब फोरम्स से जुड़ने वाले लिंक टेलीग्राम चैनलों के जरिए साझा कर रहे हैं। इससे अपराधियों की पहचान करना और उनकी गतिविधियों पर नजर रखना जांच एजेंसियों के लिए अधिक कठिन हो गया है। केंद्र का दावा है कि टेलीग्राम का उपयोग विभिन्न थ्रेट एक्टर्स को जोड़ने और उनके गैरकानूनी नेटवर्क को मजबूत करने में किया जा रहा है।

NEET पेपर लीक बना कार्रवाई की बड़ी वजह

सरकार की कार्रवाई का मुख्य आधार NEET-UG 2026 पेपर लीक प्रकरण को बताया गया है। केंद्र का कहना है कि मई 2026 में आयोजित मूल परीक्षा को रद्द करने के पीछे जिन संगठित नेटवर्कों की भूमिका सामने आई, उन्होंने टेलीग्राम का व्यापक उपयोग किया था। इसी पृष्ठभूमि में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत आदेश जारी कर 22 जून तक भारत में टेलीग्राम की सेवाओं को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया। सरकार का कहना है कि 21 जून को होने वाली पुनर्परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम आवश्यक था।

मैसेज एडिट फीचर पर भी लगी रोक

केवल प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित करने का आदेश ही नहीं दिया गया, बल्कि एक अन्य निर्देश के जरिए टेलीग्राम को 30 जून तक संदेश संपादन सुविधा निष्क्रिय करने को भी कहा गया। अधिकारियों का तर्क था कि कुछ चैनलों के जरिए कथित रूप से लीक या फर्जी प्रश्नपत्र फैलाए जा रहे थे और संदेश संपादन सुविधा का इस्तेमाल टाइमस्टैम्प बदलने तथा सामग्री में बाद में फेरबदल करने के लिए किया जा रहा था। सरकार के अनुसार इससे जांच और निगरानी दोनों प्रभावित होती हैं।

टेलीग्राम ने क्या कहा?

टेलीग्राम ने अपने बचाव में दावा किया कि उसने NEET से जुड़े गैरकानूनी कंटेंट के 900 से अधिक लिंक हटा दिए हैं। कंपनी का कहना है कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग आधारित टूल्स और मानव मॉडरेशन की मदद से नियमों का उल्लंघन करने वाली सामग्री की पहचान और हटाने का काम कर रही है। कंपनी का तर्क है कि पूरे प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने के बजाय आपत्तिजनक सामग्री और संबंधित चैनलों के खिलाफ लक्षित कार्रवाई की जा सकती है।

‘नीट माफिया’ चैनल का भी जिक्र

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में ‘NEET माफिया’ नाम के एक टेलीग्राम चैनल का विशेष उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार पिछली जांच के दौरान इस चैनल के लगभग 18,617 सब्सक्राइबर थे। हलफनामे में कहा गया कि यह चैनल कथित तौर पर परीक्षा के पेपर लीक, एडवांस बुकिंग व्यवस्था, भुगतान संग्रह तंत्र और परीक्षा सामग्री उपलब्ध कराने जैसे दावों से जुड़ी सामग्री सक्रिय रूप से प्रसारित कर रहा था। सरकार का कहना है कि इस तरह के चैनलों का आकार ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि टेलीग्राम हजारों लोगों तक गैरकानूनी सामग्री को बहुत तेजी से पहुंचाने की क्षमता रखता है।

तकनीकी ढांचा भी बना चिंता का विषय

केंद्र ने अपने जवाब में टेलीग्राम के क्लाउड-आधारित तकनीकी ढांचे का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार प्लेटफॉर्म की संरचना बड़ी मात्रा में कंटेंट (NEET) के त्वरित प्रसारण की अनुमति देती है, जिससे अवैध गतिविधियों से जुड़ी सामग्री बहुत कम समय में बड़े स्तर पर फैल सकती है। यही वजह है कि सरकार इस मामले को केवल एक परीक्षा तक सीमित मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर अपराध और संगठित धोखाधड़ी से जुड़ा व्यापक मामला बता रही है।

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अब निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला केवल टेलीग्राम या NEET परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल से जुड़ा है कि डिजिटल युग में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि किसी प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग होता है तो क्या पूरे मंच को बंद करना समाधान है, या फिर केवल दोषियों और आपत्तिजनक सामग्री को निशाना बनाना ज्यादा उचित होगा? अदालत का फैसला चाहे जो हो, यह बहस आने वाले समय में इंटरनेट गवर्नेंस और नागरिक अधिकारों की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है।

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